9 Shocking Facts: भारत के एयरपोर्ट कैसे बने अरबों की मशीन? अडानी का पूरा गेम

January 26, 2026 6:35 PM
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भारत में एयरपोर्ट प्राइवेटाइजेशन कैसे हुआ, अडानी ग्रुप ने 25% एयर ट्रैफिक कैसे कंट्रोल किया, एरो और नॉन-एरो रेवेन्यू क्या है और क्या भारत एयरपोर्ट सेक्टर में मोनोपोली की तरफ बढ़ रहा है — पूरी जानकारी विस्तार से।

भारत में एयरपोर्ट पहले कैसे चलते थे

एयरपोर्ट

भारत में लंबे समय तक सभी एयरपोर्ट्स का संचालन Airports Authority of India यानी AAI करती थी। यह एक सरकारी संस्था है जिसका मुख्य उद्देश्य मुनाफा कमाना नहीं बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों को आपस में जोड़ना था। ठीक वैसे ही जैसे रेलवे या BSNL काम करते हैं। कई ऐसे छोटे शहरों में भी एयरपोर्ट बनाए गए जहां कम यात्री होते थे और घाटा तय था, लेकिन फिर भी कनेक्टिविटी के लिए उन्हें चालू रखा गया।
इस मॉडल में कुछ बड़े एयरपोर्ट मुनाफा कमाते थे, लेकिन ज़्यादातर छोटे एयरपोर्ट घाटे में चलते थे। इन घाटों की भरपाई टैक्स देने वाले लोगों के पैसों से होती थी।

सरकार ने एयरपोर्ट प्राइवेट क्यों किए

1990 के बाद जब भारत में प्राइवेट एयरलाइंस आईं और हवाई यात्रा तेजी से बढ़ी, तब सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई। नए एयरपोर्ट बनाना, पुराने एयरपोर्ट को आधुनिक बनाना और उन्हें मेंटेन करना बहुत महंगा हो गया। सरकार के पास न तो इतना पैसा था और न ही इतनी तेजी से फैसले लेने की क्षमता।
इसी वजह से Public-Private Partnership यानी PPP मॉडल लाया गया। इसमें सरकार जमीन देती है और प्राइवेट कंपनी एयरपोर्ट बनाती है, चलाती है और मेंटेन करती है। बदले में सरकार को या तो रेवेन्यू शेयर मिलता है या फिर प्रति यात्री एक Fixed amount।

एयरपोर्ट ऑपरेटर पैसे कैसे कमाते हैं

एयरपोर्ट सिर्फ फ्लाइट उतरने की जगह नहीं होते। ये असल में बड़े बिजनेस हब बन चुके हैं। एयरपोर्ट ऑपरेटर की कमाई तीन मुख्य हिस्सों में बंटी होती है।
पहला है एरो रेवेन्यू, जो फ्लाइट से जुड़ा होता है जैसे लैंडिंग फीस, पार्किंग चार्ज, टर्मिनल फीस और यूजर डेवलपमेंट फीस। यह रेवेन्यू सरकार द्वारा रेगुलेट किया जाता है, यानी ऑपरेटर मनमानी नहीं कर सकता।
दूसरा है नॉन-एरो रेवेन्यू, जिसमें एयरपोर्ट के अंदर की दुकानें, कैफे, लाउंज, ड्यूटी-फ्री शॉप, एडवरटाइजमेंट और कार पार्किंग शामिल होती है। इस पर सरकार का कोई कंट्रोल नहीं होता और यहीं से असली मोटा मुनाफा निकलता है।

जमीन से होने वाली असली कमाई

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बहुत कम लोग जानते हैं कि जब एयरपोर्ट प्राइवेट किया जाता है, तो सिर्फ रनवे और टर्मिनल ही नहीं दिए जाते, बल्कि उसके आसपास हजारों एकड़ जमीन भी दी जाती है। इस जमीन पर एयरपोर्ट ऑपरेटर होटल, मॉल, ऑफिस कॉम्प्लेक्स और रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट बना सकता है।
दिल्ली एयरपोर्ट के पास बना एरोसिटी इसका बड़ा उदाहरण है। CAG की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर सरकार खुद इस जमीन को डेवलप करती तो इससे लाखों करोड़ की कमाई हो सकती थी, लेकिन यह जमीन बहुत कम कीमत पर लीज पर दे दी गई।

अडानी ग्रुप की एंट्री और गेम चेंजिंग स्ट्रेटजी

2019 तक एयरपोर्ट सेक्टर में GMR और GVK जैसे पुराने खिलाड़ी थे। लेकिन 2019 में अडानी ग्रुप ने एंट्री ली और एक साथ छह एयरपोर्ट जीत लिए। बाद में मुंबई और नवी मुंबई एयरपोर्ट भी उनके पास आ गए। सिर्फ पांच साल में अडानी भारत का सबसे बड़ा एयरपोर्ट ऑपरेटर बन गया, जो करीब 25% पैसेंजर ट्रैफिक और 33% कार्गो हैंडल करता है।
अडानी की सबसे बड़ी चाल यह थी कि उन्होंने रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल की जगह फिक्स्ड फीस मॉडल अपनाया। इसका मतलब यह हुआ कि उनकी कमाई जितनी भी बढ़े, सरकार को दिया जाने वाला पैसा लगभग फिक्स रहता है। इससे नॉन-एरो और जमीन से होने वाली कमाई का पूरा फायदा अडानी को मिलता है।


इसके अलावा अडानी अब किराये पर दुकान देने की जगह खुद अपने ब्रांड चला रहा है, जिससे मार्जिन और ज्यादा बढ़ जाता है।

क्या एयरपोर्ट सेक्टर में मोनोपोली बन रही है

आज प्राइवेट एयरपोर्ट में ज़्यादातर कंट्रोल सिर्फ दो ग्रुप के पास है — अडानी और GMR। लेकिन GMR पर भारी कर्ज है और वह नए एयरपोर्ट लेने से बच रहा है। सरकार 11 नए एयरपोर्ट प्राइवेट करने की तैयारी में है और अगर इनमें से ज़्यादातर अडानी को मिल जाते हैं, तो यह सेक्टर लगभग मोनोपोली की तरफ चला जाएगा।
इसका असर यात्रियों पर सीधे पड़ेगा। टिकट भले ही रेगुलेट हों, लेकिन कॉफी, खाना, पार्किंग और बाकी सुविधाओं की कीमतें ऑपरेटर तय करेगा।

सरकारी बनाम प्राइवेट एयरपोर्ट की सच्चाई

AAI आज भी 121 एयरपोर्ट चला रही है, जिनमें से करीब 80 घाटे में हैं। पिछले 10 साल में AAI को लगभग 10,000 करोड़ का नुकसान हुआ है। वहीं प्राइवेट एयरपोर्ट प्रति यात्री तीन गुना ज्यादा कमाई कर रहे हैं।
यह दिखाता है कि प्राइवेट मॉडल ज्यादा एफिशिएंट है, लेकिन इसका मतलब यह भी है कि खर्च यात्रियों की जेब से निकल रहा है।

Specification & Details Table

ParameterAAI-Government Private Operators
Airports Managed121लगभग 17-18
Loss Making Airportsलगभग 80बहुत कम
Revenue Per Passenger ₹117₹387
Regulation HighLimited
Land Monetization Limited High
Non-Aero RevenueLow Very High

आगे का रास्ता: फायदा या खतरा

एयरपोर्ट प्राइवेटाइजेशन ने इंफ्रास्ट्रक्चर और सुविधा जरूर बेहतर की है, लेकिन इसके साथ पावर कुछ गिने-चुने ग्रुप के हाथ में जा रही है। सवाल यह है कि क्या भारत इस सेक्टर में संतुलन बना पाएगा, या फिर यह पूरी तरह से बड़े कॉर्पोरेट की पकड़ में चला जाएगा।
यात्री के लिए यह सुविधा बन सकती है, लेकिन महंगाई भी। अब यह सरकार की नीति और रेगुलेशन पर निर्भर करेगा कि यह सिस्टम जनता के हित में रहता है या सिर्फ कॉरपोरेट के फायदे के लिए काम करता है। Read more

Sanjeeb Singh

Hi, I am Sanjeeb Singh—founder of TimesofIndia24x7.com and a full-time news junkie. I am a proud Odia boy from Odisha who views journalism not just as a profession, but as a passion. After graduation, instead of following the corporate path, I discovered my 'Ikigai' in the world of news and digital media. Whether it’s the spinning wheels of bikes, the roaring engines of cars, the latest smartphone updates, or serious topics like health and education—I write every article from the heart so that accurate, simple, and impactful information reaches my readers. For me, writing news isn't just a job; it's a lifestyle that I live every day, 24/7.

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